Old is gold
#__जर्मनी_की_मशीन__
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बुजुर्गों के बीच बैठते हैं तो एक बात जरूर सुनने को मिलती है - "तुम्हारे तो क्या है,हमारे टाइम में ऐसे होता था".. अब इस बात को अपने -अपने अनुभव के हिसाब से जोड़ते जाएं , ढेरों उदाहरण आपको मिलते रहेंगे । देहात में हमारे बुजुर्ग खाने में थोड़े ज्यादा सशक्त होते हैं क्योंकि वो बोलते हैं कि हमारी मशीन जर्मनी की है ।
शादी ब्याह में आप चमचम-चाउमीन पर आक्रमण करते रहते हो और ताऊजी थाली में पांच-छः लड्डू डलवाकर आपके पास आकर कहते हैं कि "के पड़्या है आ कचरा म ,देशी घी का लाड्डू और ऊपर से पालर पाणी (बारिश का पानी) की होड़ थोड़ी हॉवे है।" वाकई में खुराक और पुराने जमाने वाले हमारे बुजुर्ग लोग... ये दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । खुराक के मामले में कई जगह तो बुजुर्गों ने इतिहास सा रच रखा है .. क्योंकि हर क्षेत्र में नए-नए किस्से सुनने मिलते हैं ।
वर्तमान कुरकुरे और बिस्कुट का युग है ,लेकिन हमारे बुजुर्ग लोग बाजरे की रोटी को बिस्कुट बोलते हैं । वैसे सच्च कहूँ तो हमारा पाचन -तंत्र इतना मजबूत नहीं है कि हम सुबह-सुबह बड़ा प्याला दही और दो बाजरे की मोटी -मोटी रोटी खालें क्योंकि ये कृत्य हमें अस्पताल में भर्ती भी करा सकता है। मानव शरीर भी एक मशीन है... अब कहां अशोक लेलैंड का ईंजन और कहां टाटा नैनो की फ़िरकी ?
फर्क तो होता है ना साहब ?कई बार खेतों में काम करते हुए देखते हैं कि हमारे बुजुर्ग भारी -भरकम सामान को यूं झट से उठा लेते हैं, जैसे इनमें बैल जितनी ताकत हो? जो काम दो -चार मजदूर लगवाकर हम करवाते हैं ,वो सब तो ये अकेले कर लेते हैं ।मेरे गांव में एक हमारे बड़े बाजी हैं उन्हें में अक्सर काम करते हुए देखता रहता हूँ ..वो पूरे दिन काम करते रहते हैं परंतु शाम तक भी उन्हें थकने का पता नहीं रहता । मैंने कई बार उनसे पूछा कि "बाजी आप ये सब कैसे कर लेते हैं ? साठ के करीब हो गए आप ,लेकिन आप अब भी अकेले एक ट्रॉली बालू मिट्टी की जोहड़ से खोद लेते हो परन्तु आप थकते नहीं ?आप खेत से सूखी लकड़ियों और झाड़ियों का बैल गाड़ी में जितना आये उतना गट्ठा सिर पर उठाकर ले आते हो , आखिर कैसे ?आप मीठे के ऊपर नमकीन ,नमकीन के ऊपर मीठा खा लेते हो लेकिन आपका बिल्कुल जी नही घबराता ? आप पकोड़े ,समोसे वग़ैरह- वग़ैरह को पेट भरकर खाते हो ,आपको एसिडिटी कुछ भी नहीं कहती ?" तो जवाब एक ही आता है कि -
"बेटा महारली मशीन जर्मनी की है ,क्यूंहि कोंन्नी बिगड़े इको । "
ऐसी जर्मनी की मशीन शायद आपने भी देखी होगी और उनसे बाते भी की होगी और खुद के देह से जोड़कर अचम्भा भी किया होगा । वर्तमान में हम बचपन से फ़ास्ट फ़ूड और पैकिंग के सामानों पर निर्भर होते जा रहे हैं जिससे हम बाहुबली बनने की उम्मीद छोड़ देवें तो बेहतर होगा। हमारे जानवर ज़हर खा रहे हैं और हम उनसे अमृत पाने की उम्मीद कर रहे हैं । खेतों में फसल की व्रद्धि हेतु उस पर जहर के रूप में केमिकल उर्वरक डाल रहे हैं और फिर सोने जैसा खरा अन्न पाने की उम्मीद रखते हैं ।
बुजुर्ग लोग कहते हैं कि " हम खड़े-खड़े तीन-चार किलों दूध तो कच्चा ही पी जाते थे और घी के नेताजी ब्रांड वाला पीपा(बड़ा डब्बा) भरा रखते थे जिसे हंसते- खेलते ही खा जाते थे।" अब हम क्या कहे कि सर् सुबह दूध केतली में मोल(खरीद) लेकर आते हैं ,फिर उसी में से दही जमा लेते हैं ,चाय बन जाती है और रात को सोते वक़्त पी भी लेते हैं .....? कहना तो पड़ता है ,झूठ थोड़ी ना बोलेंगे अब हम? दोस्तों !भले ही आज हम प्रोटीन शेक पर सैंकड़ों रुपये खर्च कर रहे हो , लेकिन उस जमाने की तो राबड़ी की भी बराबरी नहीं हो सकती ।
हम भले ही खुद को तुर्रम खां समझते हो लेकिन हमारी मशीन चाइनीज है और उनकी जर्मनी वाली। असल मे कट्टपा तो हमारे बुजुर्ग लोग है ..जिनमें इतना जोश है जैसे साउथ के फिल्मों में हीरो के पैर घुमाते ही तूफान आ जाता है और एक मुक्के में पांच-छः टोयोटा की गाड़ियां उछलती हुई दिखाई देती है । खैर ! कहने का मकसद यही था कि इस जर्मनी की मशीन के पीछे वजह खान-पान की ही रही होगी ? वर्तमान में तनाव ,खराब खानपान ,इलेक्ट्रॉनिक व आभासी दुनिया ने युवा पीढ़ी का मस्तिष्क कमजोर व संकुचित बना दिया है, इन्हें मिट्टी से दूर करके घर की चार दिवारी में कैद करकर रख दिया है । आज भी अगर देखें तो अचम्भा होता है कि छोटे-छोटे बच्चों में मोटापा ,बवासीर और मधुमय जैसी दिक्कतें पैदा हो गयी है ,जो चिंता का विषय है । शरीर के संदर्भ में आपने बहुत से दोहे और कहावतें सुनी होगी कि हमारा शरीर हमारे लिए कितना कीमती है ?नही भी सुनी है तो इंटरनेट पर मौजूद है आप पढ़ लीजिएगा । बुजुर्गों की सेवा कीजिये ... जर्मनी की मशीन समझकर उन्हें छोड़ मत देना कहीं यारों ! "बूढ़ा मायता बस प्यार और खिदमत का जरूरतमंद हॉवे है ...ईलिये बिन्हा स्यूं मुंह फ़ेरया काम कोंन्नी चाले लाड्डी ।"


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