#SaveDaughter

#_कब_तक_पेश_करते_रहोगे_बेटियों_को__ ❓

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आदिकाल से लेकर वर्तमान युग तक महिलाओं की स्थिति किसी से छुपी नहीं है ।वर्तमान में भले ही औरतें संघर्षशील हैं और अपनी काबिलियत हर क्षेत्र में दिखा रही हैं , लेकिन  क्या नाम पद का जीवन  ही एकमात्र वजह है नारी सशक्तीकरण का ? पढ़ लिया ,नौकरी लग गयी .... बस यहां तक क्या सब कुछ सिद्ध हो जाता है समृद्धि के नाम पर ? हर साल तरह-तरह की रिपोर्ट आती रहती है , कभी दफ्तरों में महिलाओं की बद्दतर स्थिति दिखती है तो कभी ' Me Too ' जैसे आंदोलन पूरे देश को सच्चाई से रूबरू करवाते हैं । जब  लाखों महिलाएं समाज में बेइज्जत होने के डर से चुप रहती है अपने ऊपर हुए जुल्म या दुर्व्यवहारों को बताने में तो वहीं दूसरी ओर #MeeToo कैसे सोशल मीडिया ट्रेंड में स्थिति सामने आई कि वीआईपी  औरतें भी प्रताड़ित होने से अछूती नहीं रहती ।हमने देखा कि कैसे ऊंचे पद पर आसीन औरतें भी परेशान हैं  , तो फिर हम ग्रामीण क्षेत्र या आम औरतों की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। सिनेमा,राजनीति ,तकनीकी ,व्यवसायिक आदि क्षेत्रों में औरतों की स्थिति इतनी भी सम्मानजनक नहीं है जितनी हम सोच रहे हैं ।लोग कहते है कि मुग़लों के वक़्त उनकी औरतें रेशम के तकिये पर सोती थी ताकि उनकी सुंदरता पर आंच न आये।  पहले जो था आज भी वही है बस तरीका बदल गया है । हमें आज भी लगता है कि लड़की सुंदर होनी चाहिए क्योंकि यही उसे सुयोग्य वर मिलने का एकमात्र कारण है । आपने कई लेख ,किताबें पढ़ी होंगी, जिसमें ये जिक्र होता रहता है कि नारी को जन्म से ही परहेजों में बांध दिया जाता है और उसे समय-समय पर "तुम लड़की हो" की डोज दी जाती रहती है । सुनो ! कभी भी एक तरफ से बुराइयां नहीं पनपती  ,दोनों तरफ से बराबर योगदान रहता है । आज पुरुषों को दहेज लोभी बताया जा रहा है कि वो सब तो लड़की से नहीं धन-दौलत से प्यार करते हैं । लेकिन ऐसा हर जगह नहीं हैं ।जितना हम लोगों ने बेटियों को कमजोर बनाया है उससे ज्यादा तो किसी का योगदान हो  भी नहीं सकता। आज भी आपको लगता है कि कोई राजा औऱ राजकुमार आएगा और मेरी बेटी को लेकर जाएगा..तो फिल्में औऱ धारावाहिक देखना बन्द कर देंवे । आज का वक़्त सुयोग्य का है ... लेकिन उसमे भी घर ,नौकरी ,पैसा ,सुंदरता ,गाड़ी आदि सारे घटक नहीं मिल सकते । चलो मैं सब जगह की बात तो नहीं करूंगा ,हमारे राजस्थान के शेखावाटी की बात करता हूँ । यहां कई जगह लड़कियों की शादी के 1 माह पहले से ही उबटन   रगड़ने लग जाते हैं और उस बेचारी को सूरज की एक किरण भी नहीं लगने देते क्योंकि  उन्हें लगता है कि "धूप से काली हो जाएगी बिटिया ।" मतलब उनके हिसाब से  30 दिनों में ही उसे विश्वसुंदरी बनाना है ,कहीं  ऐसा ना ही कि बेचारी विटामिन- डी की कमी से बीमार हो जाये । इस तरह की मानसिकता औरतों की स्थिति को कम आँकने के बराबर ही है ,क्योंकि इस तरह के कृत्यों से ये सिद्ध होता है जैसे दूल्हा दूध की तरह सफेद होगा और फूल की पंखुड़ियों की तरह नाज़ुक उसके हाथ-पैर होंगे ।देखिए बात ये है कि जितना मोल भाव हमने खुद अपनी बेटियों का किया है शादी के नाम पर ,उतना तो शायद किसी ने नहीं किया होगा। जरूरी भी है कि शादी से पहले योग्य वर ढूंढा जाएं क्योंकि जान से ज्यादा चाहकर बेटी को बड़ा किया जाता है ,परन्तु इतने भी अंधे मत होइए  कि  बड़ा ऑफर रखकर अपनी बेटियों की सगाई ब्याह करें । आज स्थिति ये बन गयी है कि कई गरीबों के घर बेटियां बेंची जा रही है । पैसे लेकर ब्याह देते हैं बेटियों को ,विचार करो  कितने दुख की बात है जब एक बेटी बेंची जाती है उसके दोगुने उम्र के आदमी को ।उस बेटी के भी कोई ख्वाब होंगे ,कुछ तो उसने भी सपने संजोए होंगे .. खैर! हमने कभी इस बात पर गौर ही नहीं किया । हम मस्त हैं अपनी ही शादियों में खूब खर्चा करकर।  हम शादियों को भी प्रतिस्पर्धा बनाये जा रहे हैं ।आधुनिकता के नाम पर हमने बहुत बड़ा झोड़ रच रखा है ,जिसका मैं कई लेखों में जिक्र कर चुका हूं । कमजोर आप खुद बना रहे हैं औऱ बुराई की पोटली समाज के सिर रख रहे हो ।हो सकता मैं गलत ठहराया जाऊं लेकिन ये भी तय है कि मैं पूर्णतया गलत नहीं हो सकता । दहेज लोभी बढ़ें हैं क्योंकि कई जगह दहेज ज्यादा देने के नाम पर शादियां हो रही है जिसका गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है । हमें एक ऐसे समाज के निर्माण की आवश्यकता है, जिसमें बेटियां बोझ ना हो औऱ कोई भी बाप एक बेटी के जन्म पर मायूस न हो ।  यहीं विराम देते हैं क्योंकि एक छोटा सा पक्ष लिखने की कोशिश की है ...असल मे मामला तो बहुत बड़ा है ।शुक्रिया !

   ✍️ Navedkhan

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